
अँधेरों के दायरे: यौन तस्करी की शिकार दो लड़कियों की दर्दनाक दास्तान
सेक्स के लिए नाबालिग़ लड़कियों की तस्करी आज दुनिया भर में अरबों रुपए का व्यापार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश इसका एक केंद्र बनकर उभरे हैं।
लेखक: युधिजीत भट्टाचार्जी
छायाकार: स्मिता शर्मा
इस लेख को अंग्रेज़ी या बाँग्ला में पढ़िए।
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एक ही वेश्यालय में बिकने से पहले सईदा और अंजलि एक जैसे माहौल में पल रही बच्चियाँ थीं। एक दूसरे से अनजान, मीलों के फ़ासलों पर बसीं । सईदा, बांग्लादेश के खुलना शहर में और अंजलि, पश्चिम बंगाल के शहर सिलीगुड़ी में।
सभी अल्पायु लड़कियों की तरह उनकी भी इच्छाएं थीं कि वे घर के बंधनों से मुक्त हो जाएँ, प्यार करें और अपने सपनों की दुनिया बसाएँ। दोनों अभी उस दुनिया से बिलकुल अनजान थीं, जो उनके लिए निर्ममताओं के अकल्पनीय और अंतहीन द्वार खोले प्रतीक्षारत थी।
झुग्गी-बस्ती में दो छोटे कमरों के बीच सईदा का बचपन इस तरह बीत रहा था जहां माँ-बाप की निगरानी लगभग नहीं के बराबर थी। उसकी माँ सुबह बहुत जल्दी उठकर खुलना के न्यू मार्केट चली जाती, जहां उसे दुकानों में साफ़-सफाई का काम मिला था। बाप रिक्शा चलाता था जिसमें कहने भर की ही कमाई थी। माँ के लाख समझाने पर भी सईदा ने आठवीं से पहले ही स्कूल छोड़ दिया।
सईदा एक आज़ाद तबीयत और बिंदास लड़की थी। उसकी खुशमिज़ाज आदतों से उसके दोस्त आसानी से बन जाते थे। उसे डांस बहुत पसंद था। घर में जब कोई नहीं होता था तो वह टीवी चलाकर बांग्ला और हिंदी फिल्मों के गानों में नाच की नक़ल किया करती। माँ देखती तो डाँटती। उसकी माँ ने मुझे बताया “लड़की नाचती-गाती तो पास-पड़ोस के लोग बुरा बोलते थे।"
सईदा सुन्दर थी। तराशा हुआ चेहरा, हिरनी जैसी आँखें, और ऊपर से सजना-सँवरना उसे बहुत पसंद था। एक ब्यूटी पार्लर में वह हेल्पर का काम करती थी, जहाँ वह हेयर कटिंग, वैक्सिंग और मेक अप करना सीख रही थी। घरवालों ने जब यह देखा कि लड़की, लड़कों की नज़र में चढ़ रही है तो उसकी शादी कर दी, सईदा तब 13 साल की थी। दक्षिण एशिया में बाल विवाह अवैधानिक है लेकिन आबादी के एक बड़े हिस्से में इसका चलन बंद नहीं हुआ है। सईदा अपने आदमी के अत्याचार से तंग आकर वापस मायके आ गयी।


सईदा ने माँ से बहुत कहा कि वह उसको पास की डांस अकेडमी में भर्ती करा दे। सईदा कहती थी "सीख जाऊँगी तो डांस-शो में जाकर पैसा कमाना शुरू कर दूँगी।" माँ राज़ी हो गयी और सईदा ने शादियों और दूसरे लाइव-इवेंट्स में डांस के लिए जाना शुरू कर दिया। डांस अकेडमी में उसकी दोस्ती एक लड़के से हो गयी जो अकेडमी अक्सर आया करता था। दोस्ती, जल्द ही प्यार में बदल गयी। उसने सईदा से कहा कि वह उसके साथ भारत चले, जहां उसे डांस के बदले अच्छे पैसे मिलेंगे। सईदा को इसमें भविष्य की नयी आहटें सुनाई दीं और उसने तय कर लिया कि वह उस लड़के के साथ भाग जाएगी।
चमकीली आँखोंवाली अंजलि भी घर से कमोबेश इन्हीं कारणों से भागी। उसका बचपन अपनी माँ की देखरेख में एक मलिन बस्ती में गुज़रा जहाँ माँ झुग्गी डालकर रहती थी और घरों में झाड़ू-पोछा करती थी। ग़रीबी से हालात बुरे थे और अपनी बहन से अंजलि का अक्सर झगड़ा होता था जिसकी वजह स्कूल के लिए कम पड़ रही चीज़ें थीं।
अंजलि अभी 13 साल की भी नहीं थी जब उसने स्कूल छोड़ दिया। भारत के ग़रीब परिवारों के बच्चों में यह बहुत आम है। इसके बाद अंजलि एक फ़ैक्ट्री में पैकिंग का काम करने लगी। वह स्वभाव से चुपचुप रहनेवाली लड़की थी और सबके साथ घुलमिल नहीं पाती थी इसलिए उसके बहुत कम दोस्त थे। घर में उसका साथी बकरी का एक बच्चा था जो उसके साथ ही रहता, उसके खाने में मुंह मारता और रात में उसके बिस्तर पर चढ़ जाता।
फ़ैक्ट्री में उसकी मुलाक़ात एक नौजवान से हुई जो उसे अच्छा लगने लगा। अंजलि जानती थी कि उसकी माँ उसके लिए लड़का ढूँढ रही है लेकिन उसने तय किया कि फ़ैक्ट्री में मिला वह नौजवान ही उसके लिए ठीक है। इसलिए अक्टूबर 2016 की एक शाम, जबकि चारों तरफ़ दुर्गा पूजा की चहल पहल थी, अंजलि ने एक नयी सलवार-क़मीज़ पहनी और बस पकड़कर अपने बॉयफ्रेंड से मिलने रेलवे स्टेशन पहुँच गयी। स्टेशन पर उसका बॉयफ्रेंड अपने एक दोस्त के साथ खड़ा मिला। यह देखकर एक पल को तो वह चौंकी लेकिन फिर उनके साथ कोलकाता जानेवाली ट्रेन में बैठ गयी।
उस शाम पागलों की तरह अंजलि को तलाशती उसकी माँ ने यह जाना कि वह कई दिनों से भागने का मन बना रही थी। जिस दिन अंजलि गयी उसके कुछ दिन पहले पड़ोसियों ने सुना था कि वह अपने दोस्त, उस बकरी के बच्चे से कह रही थी "मैं चली जाऊंगी तो तुम्हारा ध्यान कौन रखेगा?"
तस्करी: एक फलता फूलता उद्योग
मानवजाति को व्यथित करने वाली बुराइयों में सबसे निकृष्ट है यौनानंद के लिए बच्चों का बंधक बनाया जाना। सईदा और अंजलि ने अपनी जो कहानियां मुझे सुनाईं वे उन असंख्य पीड़ितों की कहानियों का एक अंश मात्र है। सभी आपराधिक कृत्यों की तरह इसमें शामिल क्रूरता को किसी पैमाने से नापा नहीं जा सकता लेकिन यह तो साफ़ है कि नाबालिग़ लड़कियों की यौन तस्करी का उद्योग वैश्विक सीमाएं लांघता हुआ अरबों खरबों रुपये का हो चुका है। (इस लेख को हमने क्यों महत्त्वपूर्ण समझा, यहाँ पढ़िए।)
अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के प्रायः उद्धृत अध्ययन के अनुसार 2016 में 10 लाख से ज़्यादा बच्चे यौन शोषण का शिकार हुए। चूँकि बाल वेश्यावृत्ति का पता लगाना कठिन है इसलिए रिपोर्ट स्वीकार करती है कि वास्तव में यह संख्या कहीं अधिक है। ड्रग्स ऐंड क्राइम को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की ताज़ा ग्लोबल रिपोर्ट ऑन ट्रैफ़िकिंग इन पर्सन्स ने पाया है कि 2010 में दुनिया के अलग-अलग देशों से तस्करी की 15,000 से कम रिपोर्टें थीं जो 2016 में बढ़कर क़रीब 25,000 हो गयी हैं।

यह आँकड़ा वास्तविक पीड़ितों का एक अंश भर दिखाता है; अधिकाँश का तो पता ही नहीं चल पाता। आँकड़ों के बढ़ने पर संभव है कि रोकथाम की एजेंसियां प्रभावी कदम उठा सकें लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे वह विकट सत्य सामने आ जाएगा कि मानव तस्करी ज़ोरों पर है और उसमें उन बच्चों की यौन तस्करी भी शामिल है।
"आज दुनिया भर में 7 करोड़ शरणार्थी हैं। लोग विस्थापित हैं और आर्थिक विषमता बढ़ रही है।" यह कहना है जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में पब्लिक पॉलिसी की प्रोफ़ेसर लुई शेली का, जो ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग: अ ग्लोबल पर्स्पेक्टिव पुस्तक की लेखिका भी हैं। उनकी राय में यौन तस्करी "एक फलता-फूलता उद्योग है।"
सच तो यह है कि बाल यौन तस्करी के प्रकोप से आज दुनिया का कोई भी देश अछूता नहीं रह गया है लेकिन कुछ हिस्से इस अवैध व्यापार का केंद्र बनकर उभरे हैं। ऐसा ही एक इलाक़ा वह है जहां सईदा और अंजलि का बचपन गुज़रा यानी भारत के राज्य पश्चिम बंगाल और उसकी सीमा से लगा बांग्लादेश जो 1947 के भारत विभाजन से पहले बंगाल कहा जाता था। करीब 2,250 किलोमीटर तक फैली अंतरराष्ट्रीय सीमा के बावजूद उनकी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत में साझेदारी अटूट है और उतनी ही अटूट है उस दुर्भाग्य की साझेदारी जो हर साल वहाँ की हज़ारों नादान लड़कियों के यौन शोषण की शक्ल में सामने आती है।
संख्याओं की दृष्टि से देखें तो ठीक-ठीक मालूम नहीं लेकिन जितने मामले दर्ज होते हैं या अनुमान लगाए जाते हैं वे आधे-अधूरे होने के बावजूद यह संकेत देते हैं कि यौन तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है।
भारत के नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के अनुसार 2010 से 2016 के बीच देश भर में दर्ज किये गए मानव तस्करी के 34,908 मामलों में से एक चौथाई सिर्फ़ पश्चिम बंगाल के थे। यह विशाल आँकड़ा किसी को भी चकरा देने के लिए काफ़ी है क्योंकि भारत की कुल आबादी का केवल 7 % हिस्सा ही पश्चिम बंगाल में रहता है।

सिर्फ़ 2017 में पश्चिम बंगाल से लापता 8,178 बच्चों की रिपोर्टें दर्ज कराई गईं जो उस साल पूरे भारत में लापता हुए कुल बच्चों का आठवाँ भाग थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इनमें से लापता लड़कियों की एक बड़ी संख्या वेश्यालयों में बेच दी गयी होगी। बांग्लादेश में तो स्थिति और भी बुरी है। एक सरकारी आकलन के अनुसार हर साल बांग्लादेश से 50,000 लड़कियाँ तस्करी द्वारा भारत पहुँचाई जाती हैं या भारत के रास्ते कहीं और भेज दी जाती हैं। इसमें उन लड़कियों की संख्या शामिल नहीं है जो ख़ुद बांग्लादेश में ही देहव्यापार के लिए बेच दी जाती हैं।
पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहाँ से तस्करी द्वारा लड़कियाँ न सिर्फ़ बाहर ले जाकर देहव्यापार के लिए मजबूर की जाती हैं बल्कि बाहर से भी इन्हें यहाँ लाकर इस धंधे में झोंक दिया जाता है। बांग्लादेश की मीलों तक फैली सीमा और क़रीब सौ किमी की नेपाल सीमा पर कई ऐसे स्थान हैं जहाँ सुरक्षा चौकियों के न होने का लाभ उठाकर तस्कर उन्हें इस रास्ते लाते ले जाते हैं। इनमें से कुछ लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी वाले कोलकाता महानगर के अलग-अलग रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट के वेश्यालयों में पहुँचा दी जाती हैं। बाक़ी लड़कियाँ भारत के दूसरे शहरों - दिल्ली, मुंबई, पुणे के वेश्यालयों में बेच दी जाती हैं। (भारत में वेश्यावृति वैधानिक है लेकिन इस व्यवसाय से जुड़ी कई गतिविधियाँ जैसे कि दलाली या वेश्यालय चलाना अवैध है, वैसे ही बच्चों को वेश्यावृत्ति में उतारना भी अवैध है)। तस्करी द्वारा भारत लाई गयी लड़कियाँ कई बार दोबारा चोरी-छुपे मध्यपूर्व और अन्य देशों में भेज दी जाती हैं। बहला-फुसलाकर इस भयंकर मकड़जाल में फँसाई गई ज़्यादातर लड़कियों के लिए वहाँ से निकल पाना असंभव होता है। विवश होकर वे वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं।
इस त्रासदी का सबसे बड़ा कारण ग़रीबी है। अधिकांश लड़कियाँ जो यौन तस्करों का शिकार बनती हैं वे अपने रोज़-रोज़ की ज़िंदगी के अभावों और चख़चख़ से बाहर आना चाहती हैं और ऐसे में उन्हें नौकरी और शादी के बहाने फुसलाना आसान होता है। एक ऐसे समाज में जहाँ स्त्रियों को पुरुषों से कम मान दिया जाता है और जहाँ परिवारों में लड़की को बोझ समझा जाता है, उसमें कुछ को तो खुद उनके घरवाले या रिश्तेदार ही बेच आते हैं। "यह एक समाजार्थिक समस्या है जिसकी जड़ें ग़रीबी और अशिक्षा में हैं," यह कहना है पश्चिम बंगाल के सर्वाधिक प्रभावित ज़िलों में एक साऊथ 24 परगना में यौन तस्करी विरोधी जांच अभियानों के अगुआ रहे पुलिस सुपरिंटेंडेंट तथागत बासु का।
तस्करी के लिए अनुकूल इस इलाक़े में अपराधियों का तंत्र निर्भय होकर काम करता है। कुछ पुलिस अधिकारी इन सब से आँख मूँदे रहते हैं या अपराधियों से मिले रहते हैं। पुलिस के जिन अफ़सरों को तस्करी विरोधी इकाई के लिए काम पर लगाया जाता है उनके ऊपर तस्करी की जांच पड़ताल के अलावा दूसरे अन्य सभी अपराधों की जांच की ज़िम्मेदारी भी होती है। हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों में जिस तरह से तस्करी विरोधी इकाईयां सक्रियता से वेश्यालयों में बेची गयी लड़कियों को छुड़ा पा रही हैं उसका एक कारण यौनतस्करी के विरोध में काम कर रही संस्थाएं और उनके सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं।

दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था शक्तिवाहिनी के सह संस्थापक ऋषि कांत कहते हैं - "जब भी कोई बच्चा गुम होता है, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस तुरंत छानबीन शुरू कर दे।" संस्था ने ऐसी सैकड़ों पीड़ित लड़कियों को मुक्त कराया है।
शक्तिवाहिनी जैसी संस्थाओं के आगे आने से पुलिस को मदद मिली है और रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट्स में नाबालिग़ लड़कियों की तलाश बढ़ गयी है। इन स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग यौनाचार के अड्डों और डांस बार में नक़ली ग्राहक बनकर जाते हैं। वे पुलिस को, वहाँ से मिली ज़रूरी सूचनाएं देते हैं, तलाशी टीम के साथ अभियान का हिस्सा बनते हैं। यह एक जोखिम भरा काम है।
मुंबई की एक ऐसी ही स्वयंसेवी संस्था के संस्थापक और समाजसेवी दीपेश टांक बताते हैं कि उनकी टीम के एक कर्मी उस समय संकट में पड़ गए जब एक वेश्यालय पर वे जाँच के मक़सद से गए हुए थे और उनका स्पाई कैमरा पकड़ में आ गया था। वेश्यालय में उनकी पिटाई हुई। लेकिन काम का असर होता है। उन्होंने मुम्बई के एक उपनगरीय इलाक़े के एक डांस बार का अनुभव बताया "उनको तो कुछ भी अंदाज़ा नहीं था कि रेड पड़ सकती है क्योंकि वे पुलिसवालों को पैसा देते थे।" टांक ने बताया "जब हम घुसे तो वे हैरान रह गए। यह उनका बहुत बड़ा नुक़सान था। उन्होंने हमें रोकने के लिए धमकाने की कोशिश की।" इस रेड में वहाँ फँसी हुई एक दर्जन से अधिक लड़कियों को छुड़ाया गया ।
फिर भी भारत में यौन तस्करी की रोकथाम के प्रयास वैसे ही हैं जैसे किसी पहाड़ को हथौड़े से गिराने की कोशिश। तस्करी जिस बड़े पैमाने पर जारी है उसका निदान उतने ही बड़े पैमाने पर दिए गए जवाब की माँग करता है। प्रभावकारी क़ानून और उनको अमल में लाने वाली एजेंसियाँ और शायद तस्करी के मामलों की जाँच के लिए पूरी तरह समर्पित एक राष्ट्रीय एजेंसी ही कुछ कारगर साबित हो।
लड़कियों को छुड़ाने के बाद, अधिकाँश की देखभाल की व्यवस्था नहीं होती, और उन्हें अपने ग़रीब और परेशान परिवार वालों से मदद नहीं मिलती। कई स्वयंसेवी संस्थाएं इस उम्मीद के साथ, छुड़ाई गई लड़कियों के पुनर्वास के कार्यक्रम चलाती हैं कि ये लड़कियाँ अपने घरों को वापस लौट सकेंगी, सामाजिक लांछनों से मुक्त हो सकेंगी और एक नए जीवन का आरम्भ कर सकेंगी। लेकिन इस दिशा में उल्लेखनीय अंतर तब ही दिखाई देगा जब राज्य सरकारें मुक्त कराई गयी पीड़िताओं की मदद के लिए कुछ और आगे आएंगी। "उन्हें भी हमारी और आपकी तरह जीना चाहिए।" कान्त ने कहा "उन्हें सक्षम बनाया जाना चाहिए।"
'मैं तुम्हें मारकर नदी में फेंक दूँगा'
जिस दिन सईदा घर से निकली, उसी दिन वह लड़का खुलना से उसे बस में बैठाकर एक ऐसी जगह ले गया जो भारत की सीमा से लगी हुई थी। रात हो गयी थी, दोनों एक जंगल के रास्ते पैदल चलते हुए नदी के किनारे पहुंचे। सईदा ने देखा कि उस रात कई और लोग भी जंगल पार करके नदी की ओर बढ़ रहे थे, जिनके साथ लड़कियाँ थीं। सईदा ने बहुत ध्यान नहीं दिया। नदी किनारे पहुँचकर उसके बॉयफ्रेंड ने एक पुलिसवाले को पैसा दिया और दोनों एक नाव में बैठकर नदी पार कर गए। वे अब भारत में थे।
लड़का उसे नदी किनारे एक घर में ले गया जहाँ वे कुछ दिन रहे। उसी घर में सईदा जिस एक और लड़की से मिली, उसे भी बांग्लादेश से ही लाया गया था। सईदा को कुछ शक हुआ। उसने जब अपने बॉयफ्रेंड से पूछा कि ये सब क्या है तो उसने बताया कि उसे वेश्यालय में काम करना होगा। सईदा इसके लिए तैयार नहीं हुई। "मैं तुम्हें मारकर नदी में फेंक दूँगा" उसने कहा।
अगर सईदा वहाँ से किसी तरह भाग भी जाती तो वह किसी से मदद तक नहीं माँग सकती थी क्योंकि वहाँ कोई नहीं था जिसे वह जानती हो। भारत में वह अवैध ढंग से लाई गयी थी इसलिए वह पुलिस के पास भी नहीं जा सकती थी। "मैं इतना डर गयी थी कि मैंने सोचा, ठीक है" उसने बताया। "मैंने कहा, मैं नाच सकती हूँ बस। इसके अलावा मैं वहाँ कुछ नहीं करूँगी।"


लड़के ने सईदा को हल्दिया के पास महिषादल के एक वेश्यालय में बेच दिया। महिषादल, कोलकाता के दक्षिण पश्चिम में करीब 65 किमी दूर हल्दिया नदी तट पर बसा एक औद्योगिक नगर है.
सईदा और अंजलि के अलावा महिषादल के इस वेश्यालय में बंधक बनाकर रखी गयी दस और लड़कियों ने मुझे वहां के अपने अनुभव सुनाए। यह लेख उन्हीं से हुई बातचीत पर आधारित है। यहाँ बंद हर लड़की की कहानी, एक दूसरी से मिलती जुलती है।
हाइवे से लगे ऐसे कई वेश्यालयों में से एक 'संकल्प' दोमंज़िला होटल था जिसमें करीब 24 छोटे-छोटे कमरे थे जिनका उपयोग वेश्यागमन के लिए होता था और इसके रेस्टोरेंट के पीछे की तरफ एक डांस बार भी था। लड़कियों के अनुसार इस वेश्यालय को प्रशांत भक्ता नाम का एक आदमी चलाता था। प्रशांत भक्ता से हमारा सम्पर्क नहीं हो सका और उसके वकील ने इस बारे में बात करने से इंकार कर दिया।
सईदा, जिसकी उम्र उस समय 14 साल थी, यही सोच रही थी कि ग्राहकों के सामने नाचने भर से उसकी जान छूट जाएगी। उसने मुझे बताया कि भक्ता ने उसके साथ जब बलात्कार किया तो उसकी आँखों के सामने से सारे परदे हट गए। दूसरी लड़कियों ने बताया कि यह भक्ता का तरीक़ा था जिससे वह यह पता लगाता था कि उनके साथ यौनकर्म के बदले वह ग्राहकों से कितने पैसे वसूलेगा। इसके लिए वह उन्हें अलग अलग रंगों से चिन्हित करता था जिससे वहाँ रखी गयी करीब 20 लड़कियों के रेट ज़ाहिर हो सकें। इनमें से ज़्यादातर नाबालिग़ थीं। वह उन लड़कियों को डांस बार में रखी प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठाता था जहां ग्राहक उन लड़कियों का जायज़ा ले सकें और अपनी पसंद की लड़की चुन सकें।
सईदा जैसी नई लड़कियाँ, जो लगभग कुंवारी हों- सबसे ज़्यादा महंगी थीं जिनके लिए 500 रूपये देने होते थे, उन्हें सफ़ेद रंग की कुर्सी पर बैठाया जाता था। नीली कुर्सियों पर बैठी लड़कियों के 400, और हरी कुर्सियों पर बैठी लड़कियों के रेट 300 रुपये होते थे। भक्ता के हिसाब से जो मोटी और कम आकर्षक होतीं उन्हें लाल कुर्सियां दी जाती थीं जिनका रेट 250 रुपये था। ग्राहक भक्ता को पेमेंट कर देते थे, भक्ता ने लड़कियों से कह रखा था कि पैसा मिलते ही उन्हें दे देगा। लड़कियों ने कहा कि उन्हें कभी कोई पैसा नहीं मिला।
लड़कियों ने बताया कि भक्ता उन्हें ज़बरदस्ती शराब पिलाता था ताकि वे ज़्यादा ना-नुकुर न कर सकें। सईदा को जल्द ही ये अहसास हो गया था कि शराब से उसकी चेतना कुंद हो जाती है और वह अपने साथ होने वाली यौन प्रताड़ना को महसूस नहीं कर पाती है। उसने ख़ूब शराब पीनी शुरू कर दी। वह अपने हर ग्राहक से कहती कि साथ में वह उसके लिए भी शराब लेकर आए। "टाइम पास करने का यही मेरा सहारा था- दिन भर ख़ूब शराब पीना।" उसने कहा।


सईदा को इस वेश्यालय में 2 साल हो चुके थे जब अंजलि को यहाँ बेचा गया। अंजलि अभी 16 साल की है। जिस बॉयफ्रेंड ने अंजलि से शादी का वादा किया था, वह और उसका दोस्त अंजलि को पहले कोलकाता लाए और फिर महिषादल। उन्होंने अंजलि को बियर की एक बोतल दी। अंजलि ने बियर पी और सो गयी। जब वह उठी तो उसने देखा कि उसके बॉयफ्रेंड का साथी उसके लिए साबुन, शैम्पू, कंघी और कुछ मेक अप का सामान ले आया था। उसने अंजलि से तैयार होने को कहा, और बताया की शाम को किसी से मिलवाने ले जाएगा।
अंजलि ने इस पर कोई सवाल नहीं किया और उनके साथ चलने के लिए तैयार हो गयी। उसे पता नहीं था कि उसे किसी वेश्यालय में ले जाया जा रहा है। जब वे एक अँधेरे से कमरे में पहुंचे तो उसे घबराहट होने लगी। "ये कहाँ ले आए हो?" अंजलि ने पूछा। उन्होंने बताया कि यह एक होटल है और अब वह यहीं काम करेगी। "कैसा काम?" अंजलि ने संत्रस्त अवस्था में पूछा। जब उन्होंने सब बातें बताईं तो अंजलि रोने लगी। उसके बॉयफ्रेंड का दोस्त, उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा कि वह मान जाए- मानने के अलावा उसके सामने कोई चारा भी नहीं था- वह कहने लगा कि उसको अपनी पत्नी के इलाज के लिए पैसा चाहिए था। वे यह कह कर चले गए कि दो महीने बाद आएँगे। लेकिन वे कभी नहीं आए।
अंजलि यह पहले दिन से ही समझ गयी थी कि अब विरोध करना बेकार है। लड़कियों ने मुझे बताया कि भक्ता से वे भयंकर रूप से भयभीत थीं। अगर कोई शिकायत करता या बात नहीं मानता तो वह उसे बुरी तरह पीटता था या जलती हुई सिगरेट शरीर पर रगड़ता था, जिससे वे गंभीर रूप से जल जाती थीं।
लड़कियों के लिए ये वेश्यालय एक जेल था। बिल्डिंग के सामने और पीछे वाले गेट पर हमेशा ताला लगा रहता था या वहाँ गार्ड खड़ा रहता। लड़कियों को आधी रात में सिर्फ़ खाना खाने के लिए एक गार्ड की निगरानी में सामने वाले रेस्टोरेंट में भेजा जाता था।
ग्राहकों का आना-जाना रात दिन बना रहता और लड़कियों के साथ एक दिन में बीस बार तक ज़बरदस्ती यौनकर्म होता था। कभी-कभी तो सुबह 4 बजे नशे में धुत्त ग्राहक आ जाते और उस कमरे में घुसकर अपनी पसंद की लड़की ढूँढने लगते जहाँ दिन भर की थकी-हारी लड़कियाँ सोने के लिए पस्त पड़ी होतीं। शरीर के किसी दर्द के लिए वो दर्द की दवाएं खा सकती थीं लेकिन भावनात्मक कष्टों की कौन सी दवा थी? हफ़्तों और महीनों के इस अत्याचार से वे लगभग संज्ञाशून्य हो जातीं। "बहुत बुरा लगता था, शर्म आती थी" अंजलि ने कहा "कभी-कभी तो ऐसे ग्राहक आ जाते थे जो उम्र में बहुत बड़े होते थे, हमारे पिता से भी बड़े।"
तस्करी के दर्दनाक सफ़र से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचीं और रोज़ एक जैसी हिंसा से गुज़रती लड़कियाँ एक दूसरे का सहारा बनतीं। शांत और शर्मीली अंजलि, उस सईदा से स्वभाव में काफ़ी अलग थी जो दारू के नशे में इतनी उग्र हो जाती कि कभी-कभी ग्राहकों को भी लात मार देती। बिल्कुल उलट स्वभाव की होने के बावजूद या शायद इसी वजह से दोनों में दोस्ती हो गयी। उनकी दोस्ती की वजह सिर्फ़ यह नहीं थी कि दोनों को उनके बॉयफ्रेंड्स ने धोखा दिया था या उन्हें घर से भागना पड़ा था बल्कि दोनों की माँएं घरों में झाड़ू-पोछा करके उन्हें पाल रही थीं। और फिर अंजलि की संगीत में रुचि भी वैसी थी जैसी सईदा की; यह अलग बात है कि अंजलि को परफ़ॉर्म करने की वैसी इच्छा नहीं थी। और सईदा की तरह अंजलि को भी मेकअप करना पसंद था।
जिन लड़कियों को यहाँ रहते कई साल हो गए थे उनमें से कुछ के पास सेलफ़ोन भी थे जो उनके ग्राहकों ने उन्हें दिए थे । इन फ़ोनों पर वे कभी-कभी अपने घरवालों से बात करती थीं । पूछने पर झूठ बोल देतीं कि वे किसी फ़ैक्ट्री में काम कर रही हैं, या उन्हें मेड का काम मिल गया है और वे जल्द ही घर आएँगी। एक बार सईदा ने अपनी माँ को फ़ोन किया और बताया कि वह भारत में है, डांस करती है लेकिन घर नहीं आ सकती। उसे सच कहते शर्म आ रही थी क्योंकि उसे लगता था कि यह सुनकर उसके घरवाले दुःख और शर्म से टूट जाएंगे। पुलिस को फ़ोन करने में उसे बहुत डर लगता था, ऊपर से उसे यह विश्वास भी नहीं था कि पुलिस को फोन करने से कुछ होगा। लड़कियाँ जानती थीं कि वेश्यालय में ग्राहकों की तरह आने वालों में कई पुलिस अफ़सर भी शामिल हैं और भक्ता से उनकी दोस्ती भी है।
कभी कभार वहां पुलिस, तलाशी भी लेने आती थी लेकिन लड़कियों ने बताया कि होटल के स्टाफ़ और भक्ता को इसकी ख़बर पहले ही लग जाती थी। ऐसे में उन्हें बड़ी तेज़ी से एक जगह इकट्ठा करके पिछले दरवाज़े से ग़ायब कर दिया जाता। उन्हें खेतों से होते हुए एक ऐसे घर में लेजाकर छुपा दिया जाता जिसके बारे में किसी को पता नहीं था। लेकिन इससे भी उनको कोई राहत नहीं मिलती थी। भक्ता उस घर में भी ग्राहकों को लाकर अपना यौन व्यापार जारी रखता। वहाँ कभी-कभी तो लड़कियाँ ज़मीन पर एक चादर बिछाकर भी ग्राहकों की सेवा के लिए मजबूर की जातीं।
अप्रैल 2017 की एक दोपहर पुलिस ने इस होटल के साथ-साथ बग़लवाले होटल पर भी छापा मारा जहाँ देह व्यापार चलता था। भक्ता को इसकी ख़बर नहीं थी। सईदा और अंजलि सहित कई दूसरी लड़कियाँ पुलिस से बचने के लिए पीछे की तरफ़ भागीं। उन्होंने भक्ता को कहते हुए सुना था कि पुलिस उन्हें पकड़ कर बंद कर लेगी और उनके घर वालों को पता चल जाएगा कि वे वेश्यावृत्ति करती हैं। पुलिस ने भक्ता के साथ 12 अन्य लोगों को तस्करी विरोधी अपराध और बच्चों के यौन शोषण की धाराओं के तहत गिरफ़्तार कर लिया। अंजलि और सईदा के साथ 18 दूसरी लड़कियाँ और औरतें छुड़ा ली गयीं।
अब वे मुक्त हो चुकी थीं लेकिन अब भी घर वापस जाने को आज़ाद नहीं थीं।

बिना देखरेख के अकेले बच्चे और घात लगाए शिकारी
पतझड़ का मौसम आ चुका था। हुगली नदी के किनारे डायमंड हार्बर में साउथ 24 परगना की उस सुबह दो लेन के सँकरे हाइवे के किनारे सब्ज़ीवाले और मछुआरे अपनी दुकानें लगाए बैठे थे। धुआँ छोड़ती और हॉर्न बजाती ट्रकों की आवाजाही बनी हुई थी। इनमें ज़्यादातर दुकानदार ग़रीब किसान और छोटे मछुआरों की थीं जिनका जीवन, दिन भर की इसी कमाई से चलता था। एक अधेड़ औरत तिरपाल बिछाए उकड़ूँ बैठी थी, उसके सामने भिंडी, बैंगन और आलुओं की ढेरियां लगी थीं। यहीं बगल में एक आदमी पालथी मारे बैठा था और ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें लगा कर झींगे बेच रहा था जो बाल्टियों में भरे रखे थे। ऐसे और भी कई मछुआरे थे।
विकट निर्धनता में जी रहे यहां के लोगों की तुलना में ये दुकानदार कम अभागे हैं। साउथ 24 परगना, भारत के सबसे बड़े ज़िलों में से एक है। टूटी-फूटी सड़कों और बस नाम भर के किसी उद्योग वाला यह एक पिछड़ा ज़िला है। इसका दक्षिणी अर्धभाग हुगली और गंगा नदियों के बंगाल की खाड़ी से मिलने की दिशा में बने विस्तृत डेल्टा के क़ब्ज़े में है जो भारत-बांग्ला देश की सीमा पर अपने पंजे फैलाए पड़ा है।
कृषि यहाँ लाभकारी नहीं है क्योंकि वर्षा ऋतु में बाढ़ का पानी खेतों में भर जाता है। क़रीब 10,000 वर्ग किमी में फैले दलदली ज़मीनों और मैनग्रूव जंगलों से भरे द्वीपों के इलाके सुंदरबन में ग़रीबी चरम पर है। जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले चक्रवातों से खेती और मछली पकड़ने का काम घाटे का सौदा बन चुका है। इन आर्थिक कठिनाइयों के परिणाम स्वरूप साउथ 24 परगना के गाँव-गाँव से स्त्री-पुरुष घर से दूर रोज़ी-रोटी की तलाश में निकल पड़ने को मजबूर होते हैं। हर सुबह वे ट्रेनों में ठुँसकर डायमंड हार्बर और केनिंग जैसे नगरों की ओर निकल जाते हैं, एक दूसरे पर लदे, धक्कामुक्की करते कोलकाता और उसके आसपास कारख़ानों और निर्माण स्थलों पर काम करने के लिए। इनमें बहुत से ऐसे हैं जो मध्यवर्गीय घरों में खाना पकाने और साफ़-सफ़ाई का काम करते हैं।
"देर शाम तक वे घर नहीं लौट पाते, इसलिए उनके बच्चे घरों में अकेले और असुरक्षित होते हैं," निहार रंजन राप्तन कहते हैं। वे केनिंग में यौन तस्करी के शिकार पीड़ितों का उद्धार और पुनर्वास करने वाली एक स्वयंसेवी संस्था गोरानबोस ग्राम विकास केंद्र के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं। राप्तन ने पहली बार पुलिस के साथ मिलकर तस्करी की शिकार एक लड़की को 1995 में छुड़ाया था। उन्होंने बताया "तब से इस इलाक़े में छोटी बच्चियों का ग़ायब होना एक आम बात हो गयी है। वे कहते हैं, "पहले तो यहां हमेशा हथियारबंद डकैतियां होती थीं लेकिन अब नहीं होतीं।" लड़कियों की तस्करी में कहीं अधिक फ़ायदा है।

तस्करगिरोह पहले अपने शिकार को चिह्नित करते हैं फिर उसको अकेला और बेसहारा पाकर काम शुरू कर देते हैं। "अगर मैं एक तस्कर हूँ... तो मैं देखूँगा कि लड़की भूखी है, या कोई नौकरी चाहती है, या क्या कुछ प्यार-मोहब्बत की तरफ़ आकर्षित होगी," कहना है स्वयंसेवी संस्था संलाप की तापोती भौमिक का। कोलकाता स्थित यह संस्था संलाप, तस्करी पीड़ितों की मदद करती है। अद्भुत भूरी बड़ी-बड़ी आँखों वाली तापोती के दिल में इंसानियत के लिए करुणा के साथ-साथ एक दृढ़ता भी है जो उनके काम का अनिवार्य अंग है।
वे कहती हैं कि किशोर उम्र के लड़के और कुछ नौजवान इन तस्करगिरोहों के लिए काम करते हैं जो गाँवों-क़स्बों में शिकार की तलाश में घूमते रहते हैं। वे अक्सर अल्पवयस्क लड़कियों को प्यार के झूठे दिलासे में फंसा लेते हैं। "यहां तक कि, वे फँसाई हुई लड़की से फ़र्ज़ी शादी तक कर लेते हैं," भौमिक कहती हैं "और कोई किराए की जगह लेकर एक-आध महीने तक विवाहित जोड़े की तरह रहते भी हैं।"
सौदे के अंत में मिलने वाली राशि की तुलना में ये छोटे-मोटे निवेश कोई अहमियत नहीं रखते। "सोनागाछी, कमाठीपुरा या जीबी रोड पर बैठी मौसियों को लड़कियों का इंतज़ार रहता है।" भौमिक का इशारा कोलकाता, मुम्बई और दिल्ली के रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट्स की तरफ़ है। "अगर लड़के ने लड़की फँसाने के लिए 20,000 रुपये ख़र्च किये हैं तो वह उसे 70,000 रुपये में बेच देता है।" वे कहती हैं। यह अच्छी-ख़ासी कमाई है। 50,000 रुपये का मतलब है किसी फ़ैक्ट्री मज़दूर के 5 महीने का वेतन।
ग़रीबी और अभावों में पली लड़कियों पर सेलफ़ोन और मेकअप जैसी मामूली सुविधाओं और ख़ुशियों के सब्ज़बाग़ जादुई असर दिखाते हैं। "वे चाहती हैं कि टीवी सीरियलों में जैसी ज़िंदगी दिखाई जाती है, वैसी उन्हें भी मिले।" भौमिक बताती हैं।

तस्करी का शिकार अधिकांश लड़कियाँ यौनअड्डों पर जब बेची जाती हैं, उससे पहले वहाँ तक पहुँचने की यात्रा में उनकी हिम्मत इतनी टूट चुकी होती है कि विरोध का भाव उनके मन से मिट जाता है। जो लोग उन्हें अग़वा करके लाए होते हैं, वे प्रायः इन लड़कियों के साथ मार-पीट और बलात्कार करते हैं। जो लड़की पहली बार बिककर वेश्यालय में पहुँचती है उसे यहाँ पहले से रह रही लड़कियाँ और वहाँ का माहौल उस संत्रास से थोड़ी राहत देने वाला होता है जो पिछले दिनों छल और बल के साथ घर से भगाए जाने के कारण उस पर बीत चुका होता है।
"कम से कम अब वे अपने अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त हो जाती हैं," उर्मि बसु का कहना है। उर्मि बसु, कोलकाता के एक अन्य रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट कालीघाट में स्वयंसेवी संस्था न्यू लाइट की संस्थापक हैं। यह संस्था यौन कर्मियों के बच्चों के कल्याणार्थ सक्रिय है।
बसु ने कहा, वहाँ पहुँचने के कुछ दिन बाद ही "वेश्यालय में पहले से रह रही लड़कियाँ उन्हें बताती हैं, 'भागने की कोशिश मत करना, भगोगी तो मार दी जाओगी। यह मत समझो कि हमने भागने की कोशिश नहीं की।' इसलिए वहां डर का माहौल रहता है, निराशा होती है और फिर बारम्बार बलात्कार तो चलता ही रहता है।" वेश्यालय के मालिक जितना पैसा देकर उन्हें लाते हैं वह जल्द से जल्द वसूल कर लेना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि समय बीतने के साथ लड़की की क़ीमत कम होती जाएगी।
"इसीलिए ये नयी लड़कियाँ दिन भर में 20 से 30 ग्राहक निपटाने के लिए मजबूर की जाती हैं," बसु रुंधे गले से बताती हैं। "आप देखें तो वेश्यालय में आने के वक़्त लड़की जैसी होती है उसके छः महीने बाद उसे पहचानना मुश्किल होता है। इसलिए वहाँ दो महीने गुज़ारने के बाद वह सोचती है," 'ठीक है। अब कोई चारा भी तो नहीं है?'"


'मुझे बचा लो'
बहुत कम बार ऐसा होता है जब भगाकर लाई गयी लड़की को, घर लौटने की उम्मीद धुंधली पड़ने से पहले, वहां से निकल सकने का कोई रास्ता मिल पाता है। यह तभी हो पाता है जब सही ख़बर के सहारे पुलिस कोई त्वरित कार्रवाई करती है और वह उस दुर्भाग्यपूर्ण जीवन से एक लड़की को मुक्त करा लेती है।
ऐसा ही कुछ माला के साथ हुआ। 18 साल की माला को अप्रैल 2017 में दिल्ली के दक्षिण पूर्व में आगरा शहर के एक वेश्यालय में बेच दिया गया था। यह कहानी उन साक्षात्कारों पर आधारित है जो माला, उसकी माँ और मामले की छानबीन में लगे अधिकारियों के साथ किये गए हैं।
एक वेश्यालय में बेच दिए जाने के कुछ ही दिन बाद माला ने एक ग्राहक को मना लिया कि उसके फ़ोन से वह अपनी माँ के साथ बात करना चाहती है जो साऊथ 24 परगना के एक गाँव में है। "मैं यहाँ बहुत बुरी जगह फँसी हुई हूँ," उसने फ़ोन पर कहा "मुझे यहाँ से निकालो।"
उसकी माँ तुरंत मथुरापुर पुलिस स्टेशन पहुँची, जहां वह माला की गुमशुदगी की रिपोर्ट पहले ही दर्ज करा चुकी थी। उसने पुलिस को वह नंबर दिया जिससे माला ने फ़ोन किया था। जांच-टीम, फ़ोन नंबर के सहारे आगरा में उस आदमी तक पहुँची जिसके फ़ोन से माला ने कॉल किया था। और उससे वेश्यालय का पता लगा लिया।
क़रीब छः महीने बाद आगरा के उस रेडलाइट डिस्ट्रिक्ट में पुलिस ने छापा मारा जहाँ वह वेश्यालय स्थित था। इस अभियान में करीब 100 पुलिसवाले शामिल थे जिनमें बहुत से तो सादी वर्दी में थे। जिस आदमी के फ़ोन से माला ने घर बात की थी, वह चार पुलिसवालों की टीम के आगे-आगे चलता हुआ वेश्यालय तक पहुँचा। इस टीम में मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी प्रबीर बल भी शामिल थे। वेश्यालय का दरवाज़ा खटखटाने पर वहाँ मौजूद स्टाफ़ ने उस आदमी को पहचान लिया और सबको अंदर आने दिया। बल और उसके दो साथियों ने ख़ुद को ग्राहक बताया। जब उन्होंने सुनिश्चित कर लिया कि माला वहीं कोठे में है तो अधिकारियों ने फ़ोन पर बचाव दल को सावधान कर दिया।

जब बल और उनके साथी, बिल्डिंग के बाहर तैनात पुलिसवालों से संपर्क में लगे थे, वेश्यालय के कर्मचारियों ने भाँप लिया कि यह पुलिस रेड है। "उन्होंने कोशिश की कि लड़कियों को बेड के नीचे बने बंकरों में छुपा दिया जाए," बल ने बताया। "उन्होंने हमसे भी छुप जाने को कहा।" तलाशी के बाद पुलिस ने वहाँ से पाँच लड़कियाँ और छः जवान औरतें बरामद कीं, जिनमें माला भी शामिल थी।
माला ने पुलिस को उस आदमी का विवरण बताया, जिसने साउथ 24 परगना से उसकी तस्करी की थी। माला ने बताया कि उसके सामनेवाले एक दाँत का कोना टूटा हुआ था, हाथ में फ़िरोज़ा कंगन पहनता था और बाईं बाँह पर दिल के शेप का टैटू था। बल के अनुसार, माला ने बताया कि उस आदमी ने दिल्ली में अपनी बहन के घर पर कई बार उसके साथ बलात्कार किया। माला को उस घर में कुछ दिन रखा गया उसके बाद उस व्यक्ति की बहन और बहनोई ने उसे आगरा ले जाकर एक वेश्यालय में बेच दिया। साउथ 24 परगना पुलिस ने जुलाई 2017 में गैंग के एक आरोपी तस्कर 23 वर्षीय फर्रक अली गायेन को गिरफ़्तार कर लिया, जिसकी पहचान माला के बताए ब्योरों से मिलती थी।
माला ने आदमी की बहन और बहनोई का हुलिया भी बताया, जिससे पुलिस को उनके रेखाचित्र बनाने में मदद मिली। कई महीनों बाद मुस्लिमा गायेन, जिसे पिंकी के नाम से भी जाना जाता था, और उसके पति राध्य गुप्ता को दिल्ली में गिरफ़्तार कर लिया। गायेन, उसकी बहन और बहनोई के वकील ने कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।
मथुरापुर पुलिस स्टेशन में माला को छुड़ाने में सहयोगी संस्था शक्तिवाहिनी के ऋषि कान्त और छायाकार स्मिता शर्मा को गायेन ने बताया कि उसने माला को कैसे फँसाया। उसने कहा कि उसे माला का नंबर एक मोबाइल फ़ोन चार्ज करने वाली दुकान से मिला और फिर उसने माला को फ़ोन करके दोस्ती बढ़ाई। जब उसने माला के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह उसके साथ दिल्ली में उसकी बहन के घर आ गयी।
गायेन ने कहा कि माला की तस्करी के बदले उसे लगभग 20,000 रुपये मिले । उसने बताया कि अपनी बहन के पास हर बार एक लड़की पहुँचाने के उसे इतने ही रुपये मिलते थे। उसने यह भी बताया कि डेढ़ साल में वह और उसके कुछ साथी 11 लड़कियों की तस्करी कर चुके हैं।

जब माला ने मुझे अपनी कहानी सुनाई तो मुझे महसूस हुआ कि हालात से जूझने में उसने कितने साहस से काम लिया होगा। उसने बताया कि एक बार जब वेश्यालय की मालकिन और बाक़ी लोग सो रहे थे तब उसने वहां से भागने की कोशिश भी की लेकिन जैसे ही वह दरवाज़ा खोलने बढ़ी, किसी ने उसे पकड़ लिया।
"भागते हुए पकड़े जाने पर बुरी तरह पिटाई होती थी, इसलिए दूसरी लड़कियाँ डरी रहती थीं," माला ने मुझसे कहा। "मैंने कहा पिटाई होगी तो क्या हुआ, मुझे तो हर क़ीमत पर यहां से निकलना है।"
घर पहुँचने के बाद माला ने एक आदमी से शादी कर ली, जो मानता था कि कैसी-कैसी अग्निपरीक्षाओं को पार करके वापस आई माला को शर्मिन्दा होने की ज़रूरत नहीं है और न ही, किसी को उसे दोषी ठहराना चाहिए। दोनों अपने बच्चे के साथ माला के घरवालों के साथ ही रहते हैं।
'अभी मुझे और कितना रोना है?'
सईदा और अंजलि की उम्र तब 17 साल थी जब मैं उनसे नरेंद्रपुर में एक स्वयंसेवी संस्था संलाप द्वारा संचालित एक उद्धार आश्रम 'स्नेह' में मिला। नरेंद्रपुर, कोलकाता महानगर का एक बाहरी इलाक़ा है जहां मैं कभी एक अंग्रेज़ी दैनिक का अपराध संवाददाता था। ऊँची चारदीवारियों से घिरे एक हरेभरे परिसर में बड़ी शान्ति के बीच, कुछ इमारतों का यह छोटा सा समूह स्थित है। हर समय 80 से 90 लड़कियाँ वहाँ रहती हैं। इस आश्रम में उन्हीं लड़कियों को प्रवेश मिलता है जो वेश्यालयों से मुक्त कराई गयी हों और उनको भी जिन्हें यौनकर्म में धकेले जाने का ख़तरा हो; जैसे पेशेवर यौनकर्मियों के बच्चे। परामर्श के साथ-साथ इन्हें यहाँ कुछ कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाता है; जैसे ब्लॉक प्रिंटिंग और सिलाई आदि, ताकि समाज में उनकी वापसी सुगम बनाई जा सके।
सईदा और अंजलि यहां अभी हाल ही में उन 10 अन्य लड़कियों के साथ लाई गयी थीं जिन्हें महिषादल के वेश्यालय से मुक्त कराया गया था। संलाप के लोगों ने जब इन लड़कियों से पूछा कि क्या वे मुझसे मिलना चाहेंगी, तो उन्होंने अपनी सहमति दे दी। लड़कियों की निगरानी के लिए नियुक्त सुपरवाइज़र-इन-चार्ज उन्हें एक बड़े से हॉल में लेकर आई जहां मैं संलाप के एक प्रतिनिधि के साथ इंतज़ार कर रहा था।

अपनी चप्पलें बाहर उतार कर वे अंदर आईं। आपस में चल रही अपनी बातों को उन्होंने अचानक विराम दे दिया और मुझे एक संदेह की दृष्टि से देखने लगीं। अजनबीपन तब थोड़ा कम हुआ जब दरी बिछाने में, मैं उनका हाथ बँटाने लगा। हम एक गोल घेरा बना कर नीचे बैठ गए। घर पर मैं बांग्ला बोलता हुआ ही बड़ा हुआ हूँ। जैसे ही मैंने बांग्ला में बातचीत शुरू की- लड़कियाँ और भी सहज हो गयीं।
मैंने उन्हें बताया कि मैं यौन तस्करी पर एक लेख लिख रहा हूँ और यह समझना चाहता हूँ कि जिनके साथ यह घटित होता है उन पर क्या बीतती है। मैंने उनके सामने यह बात साफ़-साफ़ रख दी कि वे मेरे जिन सवालों के जवाब नहीं देना चाहती हों उनके जवाब नहीं भी दे सकती हैं। सईदा मेरे दाईं ओर बैठी थी और मैंने देखा, वह बात करने के लिए सबसे अधिक उत्सुक थी। उसकी आँखों में शरारत थी, चेहरे पर मुस्कान थी और उसका आत्मविश्वास उसे बाक़ियों से अलग कर रहा था। जब मैंने उससे पूछा कि वह वेश्यालय तक कैसे पहुँची तो उसने निःसंग भाव से बताया कि वह जिस लड़के से प्यार करती थी उसी ने उसे धोखा दिया। उसने बताया कि वेश्यालय का स्टाफ़ किस तरह लड़कियों पर कड़ी नज़र रखता था और किस तरह वहॉं का मालिक भक्ता उसे और दूसरी लड़कियों को नियम से पीटा करता था।
"वह तब तक पीटता जब तक ख़ून न निकाल दे," सईदा की बग़ल में बैठी अंजलि बीच में ही बोली।
"वह हमसे कहता- अगर दिन भर में कम से कम 10 ग्राहकों के साथ नहीं सोई तो, मैं तुम्हें मारूँगा," सईदा ने कहा।
फिर मैंने अंजलि से पूछा तो उसने बताया कि कैसे उसके बॉयफ्रेंड ने उसे वेश्यालय में पहुँचाया। "उसने कहा वह मुझसे शादी करेगा," वह घबराहट मिली मुस्कान के बीच अपने भोलेपन पर खेद जैसा जताते हुए बोली। दूसरी लड़कियाँ हंसने लगीं। मुझे ऐसा लगा कि वे अंजलि की हँसी उड़ा रही हैं लेकिन जैसे जैसे बातें आगे बढ़ीं, मुझे समझ में आया कि वे अंजलि पर नहीं हँस रहीं थीं, वे तो उसके साथ हँस रही थीं। उनकी भी कहानी वैसी ही थी।


उनमें से कुछ ने वेश्यालय से भागने की भी छिटपुट कोशिशें की थीं। अंजलि ने बताया कि एक बार भागने के लिए उसने अपने एक कस्टमर से मदद माँगी थी लेकिन उसने यह बात वहाँ की एक लड़की से बता दी और बात चलते-चलते भक्ता तक पहुँच गयी। "फिर मुझे मार पड़ी," उसने कहा।
सईदा जैसी बांग्लादेश से लाई गयी लड़कियाँ अधिक बेबस थीं। चूँकि वे अवैध ढंग से भारत लाई गयी थीं इसलिए भक्ता ने उनके दिमाग़ में यह बैठा दिया था कि उनके लिए सबसे सुरक्षित जगह वह वेश्यालय ही है। "वह कहा करता था, "तुम लोग भागना चाहती हो तो मज़े से भागो। लेकिन पुलिस तुम्हें पकड़ लेगी और फिर जेल में पड़े-पड़े सड़ोगी।" सईदा ने मुझे बताया।
मेरी बातचीत जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही थी, मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे उनकी तकलीफ़ों और मेरी समझ का फ़ासला बढ़ता ही चला जा रहा हो। उनमें से एक ने बताया कि उसके एक जाननेवाले ने उसे नौकरी दिलाने और शादी करने का वादा किया था। जब वह उसके साथ घर छोड़कर बांग्लादेश से निकली तो वह अपने पिता से अपनी तीन महीने की बेटी को देखने के लिए कह कर आई थी। वेश्यालय में बेच दिए जाने के महीनों बाद जब उसे अपना फ़ोन वापस मिला तो वह अपने पिता से बीच-बीच में बात कर लेती थी। वह पिता से कहती थी कि उसे एक फ़ैक्ट्री में काम मिल गया है और वह तब तक घर वापस नहीं आ सकती जब तक मालिक का उधार नहीं लौटा देती। जैसे जैसे समय बीतता गया, उसके पिता ग़ुस्साने लगे। उसने बताया कि एक दिन उसके पिता ने उसे फ़ोन करके कहा "अब दो साल हो चुके हैं। तुमने कहा था कि तुम छः महीने में वापस आ जाओगी। अब आ जाओ वरना मेरे मरने के बाद लड़की को कौन देखेगा?"
वे जब कहते कि अपने मालिक से बात कराओ तो वह भक्ता को फ़ोन दे देती। उसके पिता भक्ता से विनती करते कि वह उनकी लड़की को घर आने दे। लेकिन भक्ता का दिल कभी नरम न पड़ता और वह हर बार कहता कि उसे अभी कुछ महीने और काम करना पड़ेगा। फिर एक दिन उसके पिता का फ़ोन आया कि उसकी बेटी मर गयी है। "मैं दो दिन तक रोती रही", उसने मुझे बताया। फिर एक दिन जब उसने अपनी बहन से फ़ोन पर बात की तब पता चला कि बेटी ज़िंदा है। उसके पिता ने मजबूरन झूठ बोला था कि शायद यह सुनकर भक्ता का मन बदल जाए और वह उनकी लड़की को आने दे।
अगली सुबह जब मैं आश्रम पहुँचा तो मैंने कहा, मैं सईदा और अंजलि से दुबारा बात करना चाहता हूँ। मुझे लगा कि वे ही सबसे ज़्यादा खुलकर बात कर रही हैं। सईदा के चेहरे पर खिली हुई मुस्कान थी उसके माथे और गालों पर लाल, नीले, हरे गुलाल का रंग लगा था। यह बस होली के बाद की बात है। मैंने देखा सईदा ख़ुशी-ख़ुशी अपना चेहरा रंगों से पुतवाए बैठी है, जो उसे सुबह आश्रम की लड़कियों ने लगाए थे। अंजलि को बस थोड़ा सा ही रंग लगा था।
दोनों ने अपने भयानक अनुभव इस तरह सुनाए जैसे वे किसी और की कहानियाँ हों। उनका यह अंदाज़ मुझे चौंका देने वाला मालूम हुआ।

अपने यौन उत्पीड़न के बारे में वे अधिक बात नहीं करना चाह रही थीं। इसके बजाय उन्होंने अपने ऊपर हुई शारीरिक हिंसा के बारे में बताया। अंजलि ने अपने होंठ पर एक दाग़ दिखाते हुए बताया कि वहां भक्ता ने सिगरेट से जलाया था। सईदा ने कहा कि भक्ता कभी कभी लड़कियों से एक दूसरे को बेल्ट या डंडे से पिटवाता और बैठकर तमाशा देखा करता था।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या सवाल करूँ जिससे वे अपने उत्पीड़न की कहानी कह सकें। मैंने सईदा से पूछा कि इन तीन सालों में, जब तक वह बंधक रही, कितना रोई होगी? तुरंत ही मुझे लगा कि कैसा फ़ालतू सवाल मैंने पूछा। "अरे, मैं तो बस रोती ही तो रही, कितना रो सकती थी?" उसकी आवाज़ में एक बेबसी थी और एक पराजय, जो मैंने इतनी कम उम्र में किसी में नहीं देखी थी। उसका दुःख इतना गाढ़ा था जो उसके आँसुओं की कई बारिशों से भी धुल नहीं सकता था।
उसने मुझसे बताया कि उस नरक में ज़िंदा रहने का सहारा शराब ही थी, वह लगातार पीती रहती थी। तभी अंजलि बोल उठी कि सईदा पीने के बाद झगड़ा करने लगती। कभी ऐसा भी होता, अंजलि ने कहा, सईदा हम लड़कियों के बीच बैठकर रोती और कहती कि उसे घर की बहुत याद आ रही है।
मैंने उनसे पूछा कि घर लौटकर वे क्या करेंगी। अंजलि ने कहा कुछ पक्का नहीं है।
"एक बार फिर प्यार करोगी ?" सईदा ने हँसते हुए पूछा।
"नहीं, अब नहीं।" अंजलि बोली।
"मैं तो घर पहुंचकर अल्लाह का शुक्र अदा करूँगी और क़ुरआन शरीफ़ पढ़ना सीखूँगी।" सईदा ने कहा, और देखूँगी कि उसी ब्यूटी पार्लर में काम मिल जाए जहाँ पहले मैं किया करती थी। "डांस में तो वापस नहीं जाऊँगी। हो सका तो पढ़ाई करूँगी।"
"शायद मैं डांस सीख लूँगी," अंजलि ने कहा।
"नहीं, डांस मत सीखना," सईदा ने उसे समझाया, "उससे तो फिर फँस जाओगी।"
जब हम बाहर आये तो सईदा ने मुझसे यह माँग की कि मैं अपने फ़ोन पर बांग्लादेश में उसके शहर का सैटेलाइट व्यू दिखाऊं। वह चाहती थी कि वह मुझे वहां की नामी मस्जिद के बगल में अपना घर दिखा दे जहाँ उसके घरवाले रहते हैं। मैं अपने फ़ोन पर वह दिखा न सका। लेकिन मैंने उससे वादा किया कि जब वह घर पहुँच जाएगी तब मैं उससे मिलने खुलना आऊँगा।
वह मुस्कुराते हुए दौड़ी और बिल्डिंग के सामने फैले खेल के मैदान में एक झूले पर चढ़ गयी। अपनी कार की तरफ़ बढ़ते हुए उसकी हँसी की आवाज़ें मेरे कानों में पड़ती रहीं।
आप भी चाहें तो सहयोग कर सकते हैं
यौन तस्करी के पीड़ितों की ओर से भारत में सक्रिय तीन समूहों के संपर्क सूत्र यहां दिए जा रहे हैं।
वेश्यालयों में फँसी नाबालिग लड़कियों की मुक्ति के लिए प्रयासरत शक्ति वाहिनी ।
यौन कर्मियों के बच्चों के कल्याणार्थ सक्रिय समूह न्यू लाइट ।
'हम हार नहीं मानेंगे'
दो साल पहले हल्दिया कचहरी के बाहर एक दोपहर, ढाबे पर वकील गिरिराज पांडा खाना खा रहे थे। गिरिराज पांडा यौन तस्करी के मामलों के मुक़दमे लड़ने में मदद करते हैं। तभी कचहरी की मंथर गति से चल रही दुनिया में अचानक एक तूफ़ान सा आ गया। पांडा ने देखा कि एक आदमी भाग रहा है और दो पुलिस वाले उसका पीछा कर रहे हैं। पुलिस वाले बहुत धीमे दौड़ रहे थे। वह आदमी तेज़ी से दौड़ता हुआ गया और अपने एक मोटरसाइकिल सवार साथी के पीछे बैठ गया। दोनों भाग गए।
पांडा ने भागते हुए आदमी को पहचान लिया। वह आदमी भक्ता था। पांडा उसे इसलिए पहचान पाए क्योंकि वह तस्करी की शिकार लड़कियों की ओर से संलाप द्वारा नियुक्त वकील थे जो भक्ता और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमें लड़ रहे थे । उस दिन भक्ता को पुलिसवाले पकड़कर कचहरी के अंदर ले जा रहे थे जब वह ख़ुद को छुड़ाकर भाग निकला। इसी तरह के आरोपों में भक्ता पहले भी अदालत के सामने पेश हो चुका था लेकिन उसके वकीलों ने उसे ज़मानत पर छुड़ा लिया था। ज़ाहिर था कि भक्ता इन नए आरोपों से बच पाने की कोई सूरत नहीं निकाल सका था इसलिए जान ख़तरे में डालकर भागने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। तब तक वह डेढ़ साल से ज़्यादा समय जेल में बिता चुका था।

नाबालिग़ लड़कियों के तस्कर और वेश्यालयों के मालिक अपने अपराधों की सज़ा से बच जाते हैं, इसका कारण सिर्फ़ यह नहीं है कि पुलिस क़ानून को लागू करने में नाकाम रहती है बल्कि भारत की न्याय प्रणाली भी उन्हें बच निकलने के कई मौक़े देती है। भारत की अदालतों में न्यायिक मामलों की भरमार है। लंबित मामलों की संख्या इतनी अधिक है कि मुक़दमे वर्षों तक चलते रहते हैं। कई बार ऐसा होता है जब अदालत के सामने प्रतिवादी को ज़मानत देने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता क्योंकि वादी, अक्षमता या भ्रष्टाचार के कारण अदालत के सामने पर्याप्त साक्ष्य नहीं रख पाता।
पांडा ने मुझे बताया कि तस्करी के मामलों में प्रतिवादी, दोषियों को बचाने के लिए धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल करते हैं। "वे आराम से लाखों रुपये वकील पर ख़र्च कर सकते हैं," उन्होंने कहा। गवाहों को डराना या पैसे देकर ख़रीद लेना आम है। किसी वेश्यालय पर छापे के बाद पहला काम, बचाए गए पीड़ितों के हलफ़नामे होते हैं। पांडा ने कहा, जब पीड़ितों को अदालत परिसर में लाया जाता है तब प्रतिवादी के गुंडे आसपास घूम रहे होते हैं। वे पीड़ितों को डराते हैं। अगर उन्हें पास जाने का मौक़ा न मिले तो वे इशारों से और आँख दिखाकर धमकाते हैं। "अगर वे बांग्लादेश या नेपाल से लाई गयी होती हैं तो वे उनसे कहते हैं कि अगर वे नहीं मानीं तो वे कभी अपने देश वापस नहीं जा पाएंगी।" पांडा ने बताया।
ज़मानत मिल जाने के बाद ये अभियुक्त, लड़कियों के परिवारवालों को भय दिखाकर मजबूर करते हैं। परिवारवालों के दबाव में लड़कियाँ अपने बयान या तो बदल देती हैं या फिर उन्हें पुराना बताकर उनसे पीछा छुड़ाना चाहती हैं। जांच-पड़ताल की कमी से पैदा हुए साक्ष्यों के अभाव में केस कमज़ोर होते जाते हैं, आईआईटी खड़गपुर में यौनतस्करी के मुक़दमों के विश्लेषण पर पीएच डी कर रही अनीता चक्रवर्ती कहती हैं।
"मान लीजिये मैंने एक वेश्यालय पर छापा मारा, लेकिन मैं बिजली का बिल या ऐसा ही कोई साक्ष्य न जुटा सकी जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि अमुक व्यक्ति वेश्यालय का मालिक है" वे कहती हैं। अपने अध्ययन के दौरान उन्हें ऐसे उदाहरण भी मिले जिनमें पुलिस ने आरोपियों के ख़िलाफ़ तस्करी विरोधी या बाल संरक्षण क़ानूनों के बजाय भारतीय दंड संहिता की जिन धाराओं के तहत चार्जशीट दाख़िल की, उनमें आसानी से ज़मानत मिल जाती है, चक्रवर्ती ने हमें बताया अधिकांश मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं।
इन चिंताजनक स्थितियों में भी ऐसा नहीं है कि यौन तस्करों को अदालतों के दरवाज़ों तक लाने की कोशिशें छोड़ दी गयी हैं। माला की तस्करी के आरोपियों के मुक़दमे साउथ 24 परगना में जारी हैं। इस मामले में वकील देबरंजन बनर्जी ने मुझे बताया कि तस्करों के लिए काम कर रहे लोगों ने उन्हें पैसे का लालच दिया ताकि वे केस कमज़ोर दें और आरोपी ज़मानत पर रिहा हो जाएं। कुछ शुरुआती सुनवाइयों के दौरान तस्करों के गुंडे उन्हें अदालत परिसर में घूमते नज़र आए। कुछ ने अपनी जींस में पिस्तौलें खोंसी हुई थीं। "उनका मक़सद मुझे डराना था," बनर्जी ने कहा। उनकी मांग पर पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी। आरोपियों को ज़मानत नहीं मिल सकी।


पांडा ने बताया कि पिछले छः सालों में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हल्दिया इलाक़े में तस्करी के एक दर्जन से अधिक आरोपियों को सज़ा दिलाई है। उन्होंने बताया कि वे भक्ता पर लगे आरोपों को सिद्ध करने के लिए लड़ेंगे, जो भागने के कुछ ही हफ़्तों बाद ढूढ़ लिया गया था और अब गिरफ्तार है।
केस अभी चल रहा है और बरसों तक चल सकता है। अदालत के एक निर्णय के तहत कुछ महीने पहले भक्ता को ज़मानत मिल गयी।पांडा ने कहा अभियोजन पक्ष अपील करेगा। "वेश्यालय के मालिक और तस्कर बहुत पैसेवाले होते हैं और वकीलों को मुंहमांगी फ़ीस दे सकते हैं इसलिए वे आसानी से बरी हो जाते हैं," पांडा ने कहा "लेकिन हम हार नहीं मानेंगे।"
सीधे सादे लोग
स्नेह आश्रम से मेरे लौटने के कुछ महीने बाद सईदा को पेट में भयंकर दर्द उठा। कुछ ही दिन पहले आश्रम के एक कार्यक्रम में उसने बहुत ख़ुशी-ख़ुशी डांस किया था। लेकिन अब वह कुछ खा भी नहीं पा रही थी। उसके पेट में सूजन आ गयी थी। उसकी साँस फूलने लगी। स्नेह के लोग उसे फ़ौरन अस्पताल ले गए, जहां थोड़ी देर बाद उसकी मौत हो गयी। डॉक्टरों ने सईदा की मौत की वजह बताई- लिवर का फ़ेल होना, जो उसके बहुत शराब पीने से हुआ होगा।
आश्रम में यह ख़बर सुनकर लड़कियाँ स्तब्ध रह गयीं, ख़ासकर अंजलि। "हम बहुत रोए," उसने मुझे बताया कि किस तरह सईदा सबको हँसाती रहती थी। "हम उसे आख़िरी बार देखना चाहते थे।" लेकिन वे देख नहीं सकीं। सईदा का शव एक वैन से भारत-बांग्लादेश की सीमा पर बेनापोल पहुँचा दिया गया, जहां उसके पिता इंतज़ार कर रहे थे। मुझे बताया गया कि जब सईदा की लाश घर ले जाने के लिए दूसरी वैन में रखी जा रही थी, वे चुपचाप बुत बने खड़े थे।
मैं और हमारी फ़ोटोग्राफ़र स्मिता शर्मा नवम्बर 2018 में सईदा के परिवार से मिलने खुलना पहुँचे। सईदा से अपनी मुलाक़ात के समय मैंने सोचा था कि उसके परिवार से मिलने जाऊंगा तो वह एक ख़ुशी का मौका होगा। लेकिन अब तो हालात कुछ और ही थे। जिस नामी मस्जिद को सईदा उस दिन मुझे फ़ोन पर दिखाना चाहती थी, उससे गुज़रते हुए हमने गलियाँ पार कीं और एक चाय की दुकान के पास गाड़ी खड़ी कर दी। सलवार क़मीज़ पहने एक नाटी-गिट्ठी औरत, जो सईदा की माँ थी, हमें एक गली के रास्ते उस घर में ले गयी जहां सईदा का बचपन गुज़रा था। एक कमज़ोर, थका हारा आदमी जो सईदा का पिता था उसने उदासी के साथ हमारा स्वागत किया। घर के बाहरी हिस्से में कोई फ़र्नीचर नहीं था इसलिए हमें घर के भीतर ही बुला लिया गया जहां एक बेड लगा था। दोपहर की पीली धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी। मैं और स्मिता बिस्तर पर पालथी मारकर बैठ गए।
यही वह जगह थी जहाँ सईदा के बचपन का एक बड़ा हिस्सा गुज़रा था। उसकी माँ ने बताया कि जब सईदा के पिता उसका शव घर लेकर पहुँचे तो पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था, लोग रो रहे थे। "अगर आप बाज़ार जाएँ तो कोई भी आपको बता देगा कि सईदा को सब कितना चाहते थे," उसने कहा। जब सईदा की माँ मुझे बताने लगी कि उसकी बेटी को नाचने और गाने का कितना शौक़ था, तो मैंने उसे डांस प्रोग्राम के बाद लिया गया वह फ़ोटो दिखाया जिसमें सईदा, अंजलि और दूसरी लड़कियों के साथ दिख रही है। एक चमकीली मैजेंटा साड़ी और सिर पर पीला ताज पहने सईदा का चेहरा मुस्कान से दमक रहा था।


उसकी माँ ने एक नज़र फ़ोटो को देखा और रोने लगी। "कितनी सीधी-सच्ची लड़की थी मेरी," कहते हुए वह अपने आँसू पोछती जाती थी। "तभी तो मर गयी।"
वह उठी और दो-एक फ़ोटोअल्बम ले आई और हमें सईदा के बचपन के फ़ोटो दिखाने लगी। "उसे पहनने-ओढ़ने और सजने का बड़ा शौक़ था, वह सुंदर लगना चाहती थी", उसकी माँ ने कहा "कोई भी देखता तो यह नहीं कह सकता था कि वह मेरी बेटी है।" उसने बहुत ख़ुशी-ख़ुशी बताया कि सईदा मेकअप बहुत अच्छा कर लेती थी। अगर उसे कहीं शादी-ब्याह में जाना होता तो उसका मेकअप सईदा ही करती थी। सईदा का मेकअप का सामान, साड़ियाँ और सैंडल, सब अभी तक एक बॉक्स में रखे थे। सईदा की माँ सोच भी नहीं सकती कि उन चीज़ों को कभी घर से हटा पाएगी। उसने बताया कि कभी-कभी छोटे बच्चों की भीड़ सईदा के पीछे लग जाती, वो सभी घर आ जाते और सईदा उन्हें बॉलीवुड फ़िल्मों के नाच सिखाती। जब डांस ख़त्म हो जाता तो वह उनको कटोरा-कटोरा भात देती साथ में अपने वे कपड़े भी दे देती जो उसके लिए छोटे हो गए होते थे। जब उसकी माँ यह बता रही थी कि सईदा पुराने कपड़े बाँट दिया करती थी, तब मैं सोच रहा था कि अब शायद वह यही चाहती होगी कि माँ उसकी चीज़ें बाँट दे।
सईदा के माँ-बाप जानते थे कि सईदा तस्करी का शिकार हुई थी और किसी वेश्यालय में फँस गयी थी लेकिन वे जानना चाहते थे कि उस पर क्या बीती? इसलिए मैंने उनको सईदा का इंटरव्यू सुनाया। उसकी माँ मेरे कंप्यूटर के नज़दीक आ गयी और झुककर सुनने लगी। जबकि उसके पिता दूसरे कमरे में फ़र्श पर बैठे सूनी आँखों से दीवार तकते हुए उसका इंटरव्यू सुनते रहे। कुछ ही देर बाद जब इंटरव्यू का वह हिस्सा आया जहां सईदा वेश्यालय में हुए असहनीय अनुभव बताने लगी तब उसकी माँ असहज होकर अलग हट गयी जबकि उसके पिता ने अपना सिर दूसरी दिशा में मोड़ लिया।
"इसके आगे सुनना बहुत ज़्यादा दर्द देगा।" मैंने कहा।
सईदा की मां ने मेरी तरफ़ देखा, उसकी आँखों में आँसू थे। "अब तो दुःख ही दुःख है।" उसने कहा। "दुःख है कि ख़त्म ही नहीं होता।"
उस दोपहर सईदा के पिता एक शब्द भी नहीं बोले। मैं अगले दिन जब उनसे विदा लेने पहुंचा तो आख़िरकार बोले, "मेरी तो दुनिया लुट गयी।" "वह कितना ख़ुश रहती थी और सबको ख़ुशी बाँटती थी, और अब देखो वह चली गयी।" सईदा के जाने के बाद, उन्होंने कहा कि उनकी हालत अजीब हो गयी है, भूख नहीं लगती और नहाना भूल जाते हैं। रिक्शे में सवारियां बैठाने के बजाय सड़क के किनारे घंटों उदास बैठे रहते हैं।
"बस हर वक़्त मेरी लड़की की सूरत आँखों के सामने घूमती रहती है।" उन्होंने कहा। सईदा की माँ ने बताया कि उनके पति को लगता है कि अगर उन्होंने सईदा को डांस अकेडमी में न भेजा होता तो यह सब न हुआ होता।उसे उम्मीद थी कि सईदा का इंटरव्यू सुन लेने के बाद वे समझ जाएंगे कि डांस का शौक़ उसकी मौत का कारण नहीं बना। सईदा के पिता ने माना कि उन्हें लड़की के इंटरव्यू से यह तो समझ में आ रहा है कि उसे किसी ने फुसला लिया था। लेकिन उनके दुखी मन को समझाने में हर तर्क नाकाम था।
"अगर उसने डांस न सीखा होता," वे बोले, "मेरी लड़की इस तरह न मरती।" सईदा मर कर भी खुद पर लगा वह लांछन मिटा न सकी जो तस्करी की शिकार लड़कियों पर लगाया जाता है कि वे अपने ही कर्मों के कारण यौनशोषण की चक्की में पिसने के लिए फ़ेंक दी जाती हैं।
'अब मुझे किसी से कोई प्यार नहीं है'
महिला शरणालय में डेढ़ साल रहने के बाद अंजलि आख़िरकार अपनी माँ के पास सिलीगुड़ी पहुँच गयी और वहाँ एक फ़ैक्ट्री में काम करने लगी। साल 2019 के दिसंबर महीने में जब मैं अंजलि से मिलने उसके घर पहुँचा तो वह घरेलू कामों में अपनी माँ का हाथ बँटा रही थी।
अंजलि ने बताया कि वह यहाँ बहुत अकेलापन महसूस करती है। उसे आश्रम की लड़कियाँ अक्सर याद आती हैं, "मेरा दुःख जितना वे समझ पाती थीं उतना कोई नहीं समझ सकता।" उसने अपनी माँ से भी ज़्यादा कुछ नहीं बताया कि उसके साथ क्या बीती। पड़ोसियों को मालूम था कि दो-ढाई साल से वह ग़ायब है। कुछ ने सुन रखा था कि वह एक महिला आश्रम में थी। अंजलि ने बताया कि उसने कुछ पड़ोसियों को कहते सुना कि वह ऐसे-वैसे पेशे में थी।
"मैं ऐसी बातों का कोई जवाब नहीं देती। मैंने कोई जवाब नहीं दिया।" वह बोली।
ज़ाहिर है पड़ोसियों के इस रवैये से अंजलि के भीतर अकेलेपन का भाव और भी गहरा हो रहा था। वह पड़ोसियों की तरफ़ से तो मुँह फेर सकती थी लेकिन माँ का क्या करती, जो लगातार उसकी कड़ी घेराबंदी रखती जिसमें अंजलि का दम घुटता रहता था।


उसकी माँ– एक नरमदिल चेहरेवाली भली औरत थी, उसने मुझे बताया कि अंजलि को लेकर उसका मन हमेशा डरा रहता है। अंजलि को जब एक फ़ैक्ट्री में काम मिला तो उसने इसी शर्त पर इजाज़त दी कि जिस शिफ़्ट में वह काम पर जाएगी उसमें कोई जवान आदमी न हो। उसे यह सुनकर सुकून हुआ था कि फ़ैक्ट्री में निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं।
"वह मुझे घर से निकलने नहीं देती।" अंजलि ने मुझसे शिकायत के स्वर में कहा।
"मैं उससे कहती हूँ, चुपचाप घर पर बैठो, तुम्हारा अपना फ़ोन है, चाहो तो टिकटॉक वीडियो देखो," उसकी माँ बोली। "अब दुबारा ऐसी ग़लती मत करना।"
मैंने कहा, यह क्या बात हुई? अंजलि की तो इसमें कोई ग़लती नहीं थी। वह तो फँस गयी। अब किसी से प्यार करना कोई ग़लती तो नहीं है ?
"हाँ, मुझे मालूम था कि उसको एक लड़के से प्यार हुआ है, लेकिन लड़का ऐसा कमीनापन करेगा यह किसे मालूम था ?" उसकी मां ने कहा, "मेरे कहने का यही मतलब है कि वह अभी छोटी है और कोई भी फुसलाकर शादी की बात कहे और कहीं लेजाकर बेच दे तो क्या होगा? पहले तो हो ही चुका है ?"
"इंसान एक ही बार तो बुद्धू बन सकता है। बार-बार तो नहीं।" अंजलि बीच में बोल उठी, "अब मैं बड़ी हो गयी हूँ।"
उसकी माँ ने उसे शांत करने का प्रयास किया। "मैं तो उससे कहती हूँ, भागना मत," माँ बोली "अगर तुमको कोई लड़का पसंद आ जाए तो हमको बताना, हम उसका घर-परिवार पता करके उससे तुम्हारी शादी कर देंगे।"
अंजलि फिर बीच में बोली "हमें नहीं करना है अब किसी से प्यार-व्यार," उसकी आवाज़ में एक पक्का फ़ैसला था।
अब वह क्या चाहती है? उसकी माँ ने मुझसे बताया, वह चाहती है कि जब भी, जहां भी वह जाना चाहे उसे जाने दिया जाए। जब वह इस हादसे के बाद वापस आई थी उसी के कुछ महीने बाद यहीं पास में रहने वाली अपनी सहेली से शाम को मिलने जाना चाह रही थी। उसकी माँ ने कहा अभी जाना ठीक नहीं है। यह सुनकर अंजलि के सिर पर जैसे भूत सवार हो गया उसने सामने रखे टीवी पर कुछ ऐसा फेंककर मारा कि टीवी टूट गया।
अंजलि चाहती थी कि उसे एक स्कूटी ख़रीद दी जाए ताकि वह आराम से फ़ैक्ट्री आ-जा सके। इस बात से वह दुखी थी कि उसकी माँ उसके बड़े भाई के लिए मोटरसाइकिल ख़रीदने का पैसा जोड़ रही है।
"सब ख़रीद दूँगी जब तुम्हारी शादी होगी," माँ ने प्यार से कहा।
अंजलि ने चिढ़ी हुई मुस्कान से माँ को देखा। अंजलि कितना भी चिढ़ जाती लेकिन वह यह भी जानती थी कि कम से कम तस्करी की मारी उन लड़कियों से तो वह ठीक हाल में है जिन्हें उनके परिवारवाले इसलिए वापस घर नहीं आने देना चाहते कि रिश्तेदारों और मोहल्लेदारों में उनकी नाक कटेगी।
यह साफ़ लग रहा था कि नयी ज़िंदगी की शुरुआत कर पाना अंजलि के लिए पहाड़ उठाने से कम नहीं है, फिर भी उसके परिवार का सहारा और खुद उसके ख़ामोश इरादे देखते हुए मैं वहां से इस उम्मीद के साथ वापस लौटा कि एक न एक दिन उसे अपने सपनों का वह आकाश मिलेगा जहाँ वह तितली बनकर उड़ सकेगी।
अंग्रेज़ी से अनुवाद: इरफ़ान